“माँ ने बहू बनने से पहले ही लड़की को थप्पड़ मार दिया… लेकिन बेटे ने जो किया, उसने सबको चौंका दिया!”

उस दोपहर घर शांत था, लेकिन उस शांति में सुकून नहीं था।

बैठक में हल्की धूप फैली हुई थी। पर्दे हवा से धीरे-धीरे हिल रहे थे। सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था, लेकिन माहौल में भारी तनाव था।

लड़की अपने प्रेमी से मिलने आई थी, लेकिन घर में उसकी मुलाकात सिर्फ उसकी माँ से हुई।

माँ ने उसे घूरते हुए कहा—

माँ:
“आज तक समझ नहीं आया कि मेरे बेटे ने तुममें ऐसा क्या देखा।”

ये शब्द सुनकर लड़की का दिल टूट गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपने आँसू रोक लिए।

माँ:
“क्या तुम्हें लगता है कि तुम इस परिवार का हिस्सा बनने के लायक हो? मेरे बेटे का एक उज्ज्वल भविष्य था। लेकिन जब से तुम उसकी ज़िंदगी में आई हो, वह हमेशा तुम्हारा साथ देता है और मेरी बातों को नज़रअंदाज़ करता है।”

लड़की ने काँपती हुई साँस ली, लेकिन चुप रही।

माँ:
“चुप क्यों हो? कुछ बोलो! या तुम्हें लगता है कि चुप रहने से तुम सही साबित हो जाओगी?”

लड़की ने धीरे से सिर उठाया।

लड़की:
“मैंने कभी उन्हें आपसे दूर करने की कोशिश नहीं की।”

माँ कड़वाहट से हँस पड़ी।

माँ:
“लेकिन तुमने यही किया। अब उसे सिर्फ तुम्हारी परवाह है।”

लड़की:
“वो आपसे बहुत प्यार करते हैं। हमेशा आपकी इज़्ज़त करते हैं।”

माँ:
“मुझसे झूठ मत बोलो। तुम कभी नहीं समझ सकती कि एक माँ अपने बेटे के लिए क्या महसूस करती है। मैंने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया है, और अब तुम मेरी जगह लेना चाहती हो।”

लड़की की आँखों में आँसू भर आए।

लड़की:
“मैं आपकी जगह कभी नहीं लेना चाहती।”

माँ:
“तो फिर उसे छोड़ दो।”

पूरा कमरा शांत हो गया।

लड़की ने अपने गले में पड़े उस हार को छुआ जो लड़के ने उसे दिया था।

फिर उसने हिम्मत जुटाकर कहा—

लड़की:
“मैं सिर्फ इसलिए उस इंसान को नहीं छोड़ सकती जिससे मैं प्यार करती हूँ, क्योंकि आप मुझसे नफ़रत करती हैं।”

इतना सुनते ही माँ का गुस्सा फूट पड़ा।

उन्होंने अचानक लड़की के गाल पर ज़ोरदार थप्पड़ मार दिया।

लड़की एक कदम पीछे हट गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे, लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की।

उसी समय दरवाज़ा खुला।

लड़का घर के अंदर आया।

उसने लड़की का लाल पड़ा गाल देखा, उसकी आँखों में आँसू देखे और अपनी माँ की तरफ देखा।

उसके हाथ से बैग नीचे गिर गया।

लड़का:
“यहाँ क्या हुआ है?”

कोई जवाब नहीं मिला।

वह लड़की के पास आया।

लड़का:
“क्या माँ ने तुम्हें मारा है?”

लड़की ने सिर झुका लिया।

उसकी खामोशी ही जवाब थी।

लड़का तुरंत अपनी माँ की ओर मुड़ा।

लड़का:
“आप ऐसा कैसे कर सकती हैं?”

माँ:
“मैं सिर्फ तुम्हारी रक्षा कर रही थी।”

लड़का:
“मेरी रक्षा? उस लड़की को चोट पहुँचाकर जिससे मैं प्यार करता हूँ?”

माँ:
“वो तुम्हें मुझसे दूर ले जा रही है।”

लड़के ने गहरी साँस ली।

लड़का:
“नहीं माँ… आप खुद मुझे अपने से दूर कर रही हैं।”

माँ की आँखें भर आईं।

माँ:
“मैं तुम्हारी माँ हूँ।”

लड़का:
“तो फिर माँ की तरह व्यवहार कीजिए। प्यार का मतलब किसी को तकलीफ़ देना नहीं होता।”

लड़की ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

लड़की:
“प्लीज़… मेरी वजह से आप दोनों मत लड़िए।”

लड़के ने उसकी तरफ देखा।

लड़का:
“इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है।”

फिर उसने अपनी माँ से कहा—

लड़का:
“ज़रूरी नहीं कि आप उसे अपनाएँ, लेकिन उसका सम्मान तो कर सकती हैं।”

माँ ने पहली बार लड़की के लाल गाल की तरफ देखा।

उन्हें अपने किए पर पछतावा होने लगा।

धीरे से उन्होंने कहा—

माँ:
“मेरा वो मतलब नहीं था…”

लेकिन लड़के ने शांत आवाज़ में कहा—

लड़का:
“माँ… जो हो गया, वही सबसे ज़्यादा दर्द देता है।”

उसने लड़की का हाथ थामा।

लड़का:
“चलो… हम यहाँ से चलते हैं।”

माँ घबराकर बोली—

माँ:
“क्या तुम मुझे छोड़कर जा रहे हो?”

लड़का दरवाज़े पर रुक गया।

लड़का:
“नहीं माँ… आपने मुझे उसी पल खो दिया, जब आपने उस लड़की को चोट पहुँचाई जिससे मैं सबसे ज़्यादा प्यार करता हूँ।”

जाने से पहले लड़की ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।

लड़की:
“मैं कभी आपका बेटा आपसे छीनना नहीं चाहती थी। मैं बस उससे सच्चा प्यार करना चाहती थी।”

दोनों घर से बाहर चले गए।

माँ अकेली रह गई।

उन्हें पहली बार समझ आया कि डर और ज़बरदस्ती से किसी का प्यार नहीं जीता जा सकता।

कभी-कभी जिसे हम सबसे ज़्यादा अपने पास रखना चाहते हैं, उसे हम अपनी ज़िद की वजह से ही खो देते हैं।

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